पहचान, आंदोलन और न्यायिक जागृति

भूमिका
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती वह किसी समाज की आत्मा, उसकी स्मृति और उसकी पहचान होती है। राजस्थानी भाषा इसी परिभाषा को सबसे गहरे रूप में चरितार्थ करती है। रेगिस्तान की धूल से लेकर अरावली की चट्टानों तक, ढोला-मारू की प्रेमगाथाओं से लेकर मीराबाई के भजनों तक राजस्थानी भाषा सदियों से राजस्थान की जनता के हृदय में बसती आई है।
फिर भी आज़ादी के सात दशकों से भी अधिक समय बाद, यह भाषा संवैधानिक मान्यता की प्रतीक्षा में खड़ी है। लगभग 16 करोड़ लोगों की मातृभाषा, देश की सातवीं सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा, अमेरिका की लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में संरक्षित, विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली यह भाषा भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है।
यह आलेख राजस्थानी भाषा के उस दीर्घ संघर्ष की गाथा है जो गांधीवादी आंदोलनों से प्रारंभ हुआ, विधानसभाओं के संकल्पों से होकर गुज़रा और अब सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्देश तक पहुँचा है।
राजस्थानी भाषा : एक समृद्ध विरासत
राजस्थानी भाषा की जड़ें अपभ्रंश और शौरसेनी प्राकृत में मिलती हैं। यह भाषा हिंदी से भी प्राचीन मानी जाती है। 8वीं-9वीं सदी से ही राजस्थानी साहित्य की परंपरा मिलती है। चारण, भाट और ढाढ़ी कवियों ने राजपूत वीरों की शौर्यगाथाएँ इसी भाषा में गाईं। मीराबाई, दादूदयाल, सुंदरदास जैसे संत-कवियों ने अपनी आत्मा की अभिव्यक्ति राजस्थानी में ही की।
राजस्थानी की प्रमुख बोलियों में मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, शेखावाटी, मेवाती और बागड़ी शामिल हैं। अमेरिका की लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस ने राजस्थानी को विश्व की समृद्धतम 13 भाषाओं में गिना है। शिकागो, मॉस्को, बर्लिन, कैम्ब्रिज जैसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों में राजस्थानी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। पाकिस्तान में भी ‘राजस्थानी कायदो’ के नाम से व्याकरण प्रचलित है।
2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में लगभग 4.36 करोड़ और देश-विदेश को मिलाकर लगभग 16 करोड़ लोग राजस्थानी बोलते हैं। भारतीय साहित्य अकादमी, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी (बीकानेर), तथा देश-दुनिया के साहित्यिक मंचों पर राजस्थानी को विशेष स्थान प्राप्त है।
संवैधानिक स्थिति और आठवीं अनुसूची का प्रश्न
भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएँ शामिल हैं, जिन्हें आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। इन भाषाओं को केंद्र व राज्य सरकार की नौकरियों में, संसद और विधानसभाओं में, शिक्षा में तथा UPSC जैसी परीक्षाओं में अनिवार्य स्थान मिलता है। राजस्थानी इस सूची से बाहर है और यही इसके संघर्ष की केंद्रीय वेदना है।
राजस्थान राजभाषा अधिनियम-1956 के अनुसार राज्य की आधिकारिक भाषा हिंदी है। इस कारण राज्य सरकार ने वर्षों तक यह तर्क दिया कि जब तक राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जाता, इसे स्कूलों में पढ़ाना संभव नहीं है। 2021 में राज्य शिक्षा बोर्ड ने अधिसूचना जारी की जिसमें शिक्षा का माध्यम हिंदी/अंग्रेजी/संस्कृत/उर्दू/पंजाबी/गुजराती रखा गया, राजस्थानी को उसमें स्थान नहीं मिला।
विडंबना यह है कि जिन भाषाओं की बोलने वाली जनसंख्या राजस्थानी से कम है, वे आठवीं अनुसूची में हैं। महापात्रा समिति ने भी राजस्थानी को इस सूची में शामिल करने योग्य पाया था। नोट पर भाषा लिखने की जगह न होने जैसे नौकरशाही के बेतुके तर्क दशकों तक इस मान्यता में बाधा बनते रहे।
भाषा मान्यता के लिए आंदोलन : एक लंबी यात्रा
स्वतंत्रता के बाद से संघर्ष की शुरुआत
राजस्थानी भाषा की मान्यता का आंदोलन आज़ादी के तुरंत बाद ही प्रारंभ हो गया था। साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और आम जनता ने मिलकर यह मांग उठाई कि राजस्थान की अपनी भाषा को उसका उचित स्थान मिले। यह संघर्ष शुरू से ही गांधीवादी तरीकों से धरने, जुलूस, ज्ञापन, हस्ताक्षर अभियान के माध्यम से चलाया जाता रहा।
2003 का ऐतिहासिक विधानसभा संकल्प
25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। सभी दलों के विधायकों ने सर्वसम्मति से संकल्प पारित किया कि राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। यह किसी राज्य विधानसभा का अपनी भाषा के लिए उठाया गया दुर्लभ एकमत निर्णय था। इस संकल्प के बाद आशा जगी कि केंद्र सरकार शीघ्र ही आवश्यक कदम उठाएगी।
केंद्र सरकार से बारंबार निवेदन
2003 के विधानसभा संकल्प के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने दल चाहे जो भी रहा हो, 2009, 2015, 2017, 2019, 2020 और 2023 में केंद्र सरकार को पत्र लिखकर राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का निवेदन किया। परंतु केंद्र सरकार में यह मामला वर्षों तक ‘विचाराधीन’ की फ़ाइल में पड़ा रहा।
संगठनों और साहित्यकारों का योगदान
राजस्थान में राजस्थानी मोट्यार परिषद, राजस्थानी भाषा संघर्ष समिति, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, और अनेक साहित्यिक संगठनों ने इस आंदोलन को जीवंत रखा। पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया जैसे राजस्थानी साहित्य के स्तंभों ने अपनी कविताओं और लेखनी से भाषा की पीड़ा को स्वर दिया। विश्व मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) पर हर वर्ष राजस्थान के विभिन्न शहरों में धरने और प्रदर्शन होते रहे हैं।
फरवरी 2026 में बीकानेर में राजस्थानी मोट्यार परिषद ने विश्व मातृभाषा दिवस पर कलेक्टर कार्यालय के समक्ष एक दिन का सांकेतिक धरना देकर मांग दोहराई। परिषद के अध्यक्ष शिवदान सिंह ने चेतावनी दी कि अब धैर्य समाप्त हो चुका है और आंदोलन को निर्णायक मोड़ पर ले जाया जाएगा।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप : पहली उम्मीद की किरण
याचिका और राजस्थान उच्च न्यायालय का रुख
जब विधायिका और कार्यपालिका के सभी द्वार बंद हो गए, तो भाषा के पैरोकार न्यायपालिका की शरण में गए। वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘माणक’ पत्रिका के संपादक पद्मेश मेहता और राजस्थानी भाषा के विद्वान कल्याण सिंह शेखावत ने राजस्थान उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। इसमें माँग की गई कि राजस्थानी को स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के रूप में और REET (शिक्षक पात्रता परीक्षा) के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने इस याचिका को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय का तर्क था कि शैक्षणिक नीति का मामला है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं होगा। इसके बाद याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गए।
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई : जनवरी 2025
10 जनवरी 2025 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ के समक्ष यह मामला (SLP(C) No. 1425/2025, पद्मेश मेहता बनाम राजस्थान राज्य) पहुँचा। वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष सिंघवी ने याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि राजस्थानी भाषा में दक्ष शिक्षकों की भर्ती न होने से करोड़ों बच्चों का मातृभाषा में शिक्षा का मौलिक अधिकार छिन रहा है।
यह भी तर्क दिया गया कि जबकि गुजराती, पंजाबी, सिंधी और उर्दू REET में शामिल हैं, राजस्थानी को जानबूझकर बाहर रखा गया है। यह अनुच्छेद 350A का उल्लंघन है जो भाषाई अल्पसंख्यकों को मातृभाषा में शिक्षा का संवैधानिक अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार, शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव और REET समन्वयक को नोटिस जारी किया।
ऐतिहासिक निर्देश : मई 2026 का क्रांतिकारी फैसला
मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी निर्देश दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने राजस्थान सरकार के ढुलमुल रवैये पर कड़ी नाराज़गी जताई और स्पष्ट शब्दों में कहा:
“यह न्यायालय संवैधानिक अधिकारों के स्पष्ट हनन पर मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता। जब राजस्थानी राज्य के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है, तो स्कूली स्तर पर इसे लागू करने में देरी क्यों?”
न्यायालय ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शामिल करने के लिए व्यापक नीति बनाए। यह आदेश केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं, बल्कि राजस्थान के हर निजी विद्यालय पर भी बाध्यकारी है।
फैसले के मुख्य बिंदु
प्रारंभिक चरण : शुरुआत में फाउंडेशनल और प्रिपरेटरी स्तर (कक्षा 1-5) पर राजस्थानी को माध्यम या विषय के रूप में जोड़ा जाए।
उत्तरोत्तर विस्तार : धीरे-धीरे इसे उच्च कक्षाओं तक भी अनिवार्य किया जाए।
REET में समावेश : राजस्थानी को शिक्षक पात्रता परीक्षा के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जाए, जिससे राजस्थानी जानने वाले शिक्षकों के लिए रोज़गार के नए अवसर खुलेंगे।
8वीं अनुसूची की बाधा अमान्य : न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक मान्यता के लिए आठवीं अनुसूची में शामिल होने की प्रतीक्षा करना तर्कहीन है। NEP 2020 बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देना राज्य का कर्तव्य बताती है और यह कर्तव्य आठवीं अनुसूची की प्रतीक्षा के बिना ही पूरा किया जाना चाहिए।
इस फैसले का महत्व और व्यापक संदेश
यह निर्देश केवल राजस्थानी भाषा की जीत नहीं है, यह भारत की समस्त भाषाई विविधता की जीत है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित किया कि भाषाई अधिकार महज़ राजनीतिक मांगें नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार हैं। NEP 2020 और RTE अधिनियम मातृभाषा आधारित शिक्षा को बच्चों का मूल अधिकार मानते हैं।
इस फैसले से राजस्थानी भाषा के शिक्षकों और साहित्यकारों के लिए नए अवसर खुलेंगे। REET में राजस्थानी के शामिल होने से राज्य के युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों के नए द्वार खुलेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बच्चे अपनी मातृभाषा में बुनियादी शिक्षा पा सकेंगे, जो शोध-सिद्ध रूप से सीखने की क्षमता को कई गुना बढ़ाती है।
यह निर्देश देश की उन सैकड़ों भाषाओं के लिए भी मार्गदर्शक बनेगा जो आठवीं अनुसूची से बाहर होने के बावजूद करोड़ों लोगों की जीवंत मातृभाषाएँ हैं। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि सरकारी उदासीनता और नौकरशाही की आड़ में भाषाई अधिकारों का हनन नहीं होने दिया जाएगा।
अभी भी अधूरा है संघर्ष
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश राजस्थानी भाषा के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, परंतु संघर्ष पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ। सबसे बड़ी माँग अभी भी लंबित है, संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी को शामिल करना। इसके बिना राजस्थानी को केंद्रीय नौकरियों में, UPSC में, संसद में और भारत सरकार की गतिविधियों में वह स्थान नहीं मिलेगा जिसकी वह अधिकारिणी है।
राजस्थानी मोट्यार परिषद जैसे संगठन और भाषा प्रेमी अब और तेज आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। प्रधानमंत्री से निवेदन किया जा रहा है कि गुजराती भाषा की जिस प्रकार देखरेख की गई, उसी प्रकार राजस्थानी का भी सम्मान किया जाए।
उपसंहार
राजस्थानी भाषा का संघर्ष केवल शब्दों और व्याकरण का संघर्ष नहीं है। यह करोड़ों राजस्थानी लोगों की अस्मिता, उनकी विरासत और उनके आत्मसम्मान का संघर्ष है। सात दशकों की प्रतीक्षा, अनगिनत धरने, विधानसभा के संकल्प, मुख्यमंत्रियों के पत्र और अंततः सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्देश।
यह यात्रा बताती है कि भाषाई अधिकारों की लड़ाई में धैर्य, निरंतरता और संगठन की शक्ति अनिवार्य है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश एक बीज है अब यह राज्य सरकार, समाज और भाषा के पैरोकारों पर निर्भर है कि इस बीज को एक विशाल वट-वृक्ष का रूप दें।
जै राजस्थान — जै राजस्थानी
‘मायड़ भाषा : हमारी पहचान, हमारा गौरव’
