भारत के सामाजिक इतिहास में डॉ. भीमराव अंबेडकर जी का नाम एक ऐसी रोशनी की तरह है, जिसने सदियों से अंधकार में जी रहे वंचित, शोषित और दलित वर्ग को नई दिशा दी। उनका जीवन केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि एक विचारधारा था—समानता, शिक्षा और अधिकारों की लड़ाई का। यही विचारधारा आज भी लाखों युवाओं को प्रेरित करती है,
मेरा जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है सीमित संसाधनों और सामाजिक विषमताओं के बीच मैंने अपने लिए एक ऐसा रास्ता चुना, जो केवल व्यक्तिगत सफलता का नहीं बल्कि समाज के उत्थान का माध्यम बना—पत्रकारिता। मैंने बाबासाहेब के उस मूल मंत्र को आत्मसात किया—“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”
पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखते ही मैंने यह तय कर लिया कि मेरी कलम केवल खबरें लिखने के लिए नहीं, बल्कि समाज के दबे-कुचले वर्ग की आवाज़ बनने के लिए चलेगी। आज के डिजिटल युग में मैंने सोशल मीडिया को एक सशक्त मंच के रूप में इस्तेमाल किया। जहां मुख्यधारा की मीडिया कई बार दलितों और मजदूरों के मुद्दों को नजरअंदाज कर देती है, वहीं मैंने उन उन मुद्दों को सामने लाने का बीड़ा उठाया।
दलितों पर होने वाले अत्याचार, मजदूरों के शोषण, और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ मैंने लगातार अपनी आवाज़ बुलंद की। मेरे द्वारा किए गए पोस्ट, वीडियो और लेख केवल सूचना देने का माध्यम नहीं होते, बल्कि लोगों को जागरूक करने और सोच बदलने का प्रयास भी होते हैं। जब कहीं किसी दलित परिवार के साथ अन्याय होता है या किसी मजदूर को उसका हक नहीं मिलता, तब मे सबसे पहले सोशल मीडिया के जरिए उस मुद्दे को उठाता हैं।
मेरी पत्रकारिता में बाबासाहेब की सोच साफ झलकती है—समानता, न्याय और आत्मसम्मान। मैं मानता हूँ कि पत्रकारिता केवल खबर दिखाने का काम नहीं है, बल्कि समाज में बदलाव लाने का एक मजबूत हथियार है। इसी सोच के साथ में लगातार काम कर रहा हूँ
आज जरूरत है ऐसे युवाओं की, जो बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों को केवल किताबों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारकर समाज के लिए काम करें। मैरे जैसे युवा इसी बदलाव की मिसाल हैं, जो यह दिखाते हैं कि एक सच्ची सोच और मजबूत इरादों के साथ समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि बाबासाहेब की प्रेरणा से ही मैंने पत्रकारिता को समाज सेवा का माध्यम बनाया और दलितों व मजदूरों की आवाज़ बनकर एक नई दिशा दी। उनका संघर्ष और समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणास्रोत रहेगा।

लेखक -अविनाश बराला
पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता
